All story: July 2012
My Web page

chidiya rani (चिड़िया रानी )

Sunday, 15 July 2012

चिड़िया रानी 
 
बच्चों एक कहानी सुन लो
बात पते की हो तो गुन लो
मम्मी डैडी के प्यारे तुम
सब जग के उजियारे तुम
एक थी सुन्दर चिड़िया रानी
जिद करने की उसने ठानी
बोली अब मैं नहीं उड़ूँगी
नहीं हवा पर पैर धरूँगी
मैं तो तैरूँगी मछली संग
रंग लूँ खुद को उनके ही रंग
मटमैला यह रंग जमे ना
ना मैं मानूँ ना ना ना ना
मां बोली तुम देखो उड़ कर
कहां है मछली के ऐसे पर
उसकी साँसे पानी में हैं
तुम्हें है उड़ना दूर गगन पर
उसकी साँसे पानी में हैं
तुम्हें है उड़ना दूर गगन पर
ना मानी और चली तैरने
डैने भीगे तैर ना पाई
फूली साँस और घबराई
सुबकी मां की गोद समाई
हंस कर मां ने गले लगाया
खूब संवारा पंख सुखाया
फिर इतराकर ऊँचे बैठे
उड़ने का वह सबक सिखाया
ऊपर आसमान पर उड़ते
वह मछली से अबके बोली
साथ साथ नहीं चलते पर
तुम भी हो मेरी हमजोली
कह कर उसने पंख पसारे
और हवा से किये इशारे
दिन भर दौड़ धूप और मस्ती
साँझ डाल और नीड़ पे बस्ती
चिड़िया मछली और सब प्राणी
सबकी अपनी अपनी वाणी
प्रेम-भाव से संग संग रहते
सभी एक से एक हैं ज्ञानी

chala bhediya (चला भेड़िया)


चला भेड़िया
सब पशुओं के दंगल में
चला भेड़िया जंगल में
जंगल में मंगल था छाया
सबने मिलकर शोर मचाया
बेचारा इतना घबराया
छुप कर सोया कंबल में

vanamanush (वनमानुष)


वनमानुष1
छोटे पैर और लंबे हाथ
दो पैरों पर तन को साध
चलता है मानुष के जैसा
देखो यह वनमानुष कैसा

yak (याक)


याक
करने चले हिमालय सैर
उठा न बोझा याक बगैर
सजा धजा एक याक मंगाया
फिर मौसम का मज़ा उठाया

hiran (हिरन)


हिरनएक हिरन का बच्चा पाया
मैंने उसको दोस्त बनाया
ना हम अटके ना हम भटके
घूमा सब जंगल बेखटके

bada sa gaunda (बड़ा सा गैंडा)


बड़ा सा गैंडा

बड़ा सा गैंडा धीमी चालनाक पे सींघ और मोटी खाल
शाकाहारी भोजन खाता
कभी किसी को नहीं सताता

bhura bhalu (भूरा भालू)









भूरा भालू
भूरा भालू झबरे बाल
मस्ती भरी निराली चाल
देखो डाल गले में आया
धारी वाला लाल रुमाल

sher (शेर)









शेरजंगल जंगल डोले शेर
बहुत बड़ा मुँह खोले शेर
मैं हू सब पशुओं का राजा
बड़ी ज़ोर से बोले शेर

Chay garam (चाय गरम)

Friday, 13 July 2012

चाय गरम
सर्दी का आया मौसम
चुहिया ने पी चाय गरम
पीकर तन में गरमी आई
घंटाघर तक दौड़ लगाई

फुटबाल


फुटबाल
चले न कोई तिरछी चाल
फूलें नहीं किसी के गाल
बड़ी छुट्टियाँ खूब धमाल
आओ हम खेलें फुटबाल

नए साल की बात


 नए साल की बात 

नए साल की बात करें
गए साल को माफ करें
अब न रहें कोई झगड़े
दूध पियें और हों तगड़े
कमरे का सारा कचरा
आओ मिल कर साफ करें
खुली धूप से मन निखरें
दोस्त बनें हम, ना बिखरें
जो कुछ अच्छा कर पाए
आओ मिल कर याद करें

हाथी बोला


हाथी बोला 1

 
 
सूँड उठा कर हाथी बोला
बोला क्या तन उसका डोला
बोला तो मन मेरा बोला
देखो देखो अरे हिंडोला

'आओ बच्चो मिलजुल आओ
आओ बैठो तुम्हें डुलाऊँ
मस्त मस्त चल, मस्त मस्त चल
झूम झूम कर तुम्हें घुमाऊँ

घूम घूम कर, झूम झूम कर
ले जाऊँगा नदी किनारे
सूँड भरूँगा पानी से मैं
छोडूँगा तुम पर फव्वारे।'

तितली


तितली

 
बाग बगीचा सुन्दर फूल
बैठी तितली जग को भूल

लगी झूलने फूलों के संग
ठंडी हवा बही अनुकूल

याद नहीं पर तितली को था
फूलों में है एक बबूल

खेल खेल में चुभा बबूल
तितली गयी पहाड़ा भूल
 

ध्यान रखेंगे


ध्यान रखेंगे

 
 
मेरी बिल्ली, आंछी आंछी
अरे हो गया उसे जुकाम

जा चूहे ललचा मत जी को
करने दे उसको आराम

दूध नहीं अब चाय चलेगी
थोड़ा हलुवा और दवाई

लग ना जाए आंछी हमको
ध्यान रखेंगे अपना भाई
 

खिड़की पर गमले


खिड़की पर गमले



 
1
सूरज निकला फूल खिले
पत्तों के संग गले मिले
खिल खिल हँसते
मिल मिल हँसते
हँसते हँसते पूछा करते,
"पीली पीली धूप उड़ाते
सूरज दादा कहां चले?"

सूरज गुमसुम देखा करता
कभी किसी से कुछ ना कहता
धूप उड़ाता
खुशी लुटाता
अपने पथ पर बढ़ता रहता
खिड़की पर सज जाते गमले
हौले से मुसकाते गमले

भरे पटाखे रावण में


 
भरे पटाखे रावण में
भरे पटाखे रावण में
लगी भीड़ चंपारण में
हल्ला गुल्ला धूम धड़ाका
मेला ठेला खूब जमा था
रामचंद्र ने छोड़ा तीर
रावण जला महा गंभीर
1मना दशहरे का त्योहार
सच की जीत दुष्ट की हार

इतना सब कुछ


इतना सब कुछ करता हूँ
फुर्सत में कब रहता हूँ 
1हल्ला गुल्ला मार पीट
उठा पटक और तान खींच
खेल खिलाड़ी कूद उछल
कभी सवार कभी पैदल
1
पढ़ना लिखना गाना गाना
चलना फिरना आना जाना
उठना गिराना गाल बजाना
रोना धोना खाना खाना
1
इतना सबकुछ करता हूँ
फुर्सत में कब रहता हूँ
 
इतना सब कुछ

तारा टूटा





 


 


 
  तारा टूटा

दूर कहीं एक तारा टूटा
क्या जाने वो किसने लूटा

छत पर कहीं नहीं था भाई
नहीं सड़क पर पड़ा दिखाई

काश कहीं अगर मिल जाता
अलमारी में उसे सजाता

जगमग जगमग करता रहता
सुबह शाम मैं देखा करता

मसखरे


मसखरे1
 1
- 
 
इधर मसखरे उधर मसखरे
सर्कस में हर तरफ मसखरे

सबको लोटमपोट हँसाते
हाथ मिलाते कड़क मसखरे

जगमग जगमग कपड़े पहने
तड़क-भड़क में मस्त मसखरे

अजब हुनर के जादूगर हैं
अभिनेता बेधड़क मसखरे

तरबूजों का मौसम


तरबूजों का मौसम
 

 गरमी के दिन धमा चौकड़ी
मस्ती हल्ला तुम हम
आया फिर इस साल लौट कर
तरबूज़ों का मौसम

दिन भर खेल खेल कर थकते
रात गये सुस्ताते
लंबे लंबे दिन होते और
छोटी छोटी रातें
पढ़ने से फिर लम्बी फुरसत
खरबूजों का मौसम
आया फिर इस साल लौट कर
तरबूज़ों का मौसम

छाँटो काटो मिल कर बाँटो
ठंडे ठंडे खीरे
रंग बिरंगे शरबत मीठे
पीते धीरे धीरे
चना चबेना लइया सत्तू
भड़भूजों का मौसम
आया फिर इस साल लौट कर
तरबूज़ों का मौसम

नन्हीं चिड़िया


नन्हीं चिड़िया नीचे आ
नीचे आ कर गीत सुना

बड़ी धूप है आसमान में
थोड़ा सा तो ले सुस्ता

पेड़ तले ठंडी साया है
साया में आ दाना खा

पंखों को थोड़ा आराम दे
मेरी गोदी में सो जा
नन्हीं चिड़िया

रंग


 
रंग

पीला नीबू लाल टमाटर
नारंगी होती है गाजर
दूध सफेद नीला आकाश
फूल गुलाबी हरी घास
बैंगन का रंग बैंगनी होता
काले रंग का होता छाता
भूरे रंग की मिट्टी होती
गमला गेरुए रंग में आता

होली का हंगामा


होली का हंगामा है !
सबको रंग लगाना है!
कहाँ बाल्टी बढ़िया है
कहाँ रंग की पुड़िया है
कहाँ रखे हैं लाल अबीर
आया है या नहीं कबीर?
पिचकारी भर लाना है!
होली संग मनाना है!

चलो चलो कपड़े बदलो
दूध पियो गुझिया खा लो
गुब्बारों की पेटी लो
सब अपनों के गले मिलो
मौसम बड़ा सुहाना है!
रंग रंग हो जाना है!
 
होली का हंगामा!

 

होली आईहोली आई!

 
 
होली आई होली आई
पिचकारी के सपने लाई
भूल भाल कर सारे वैर
फगवा खेलें सब मिल भाई
धरती दुल्हन सी लगती है
अबीर ने ली है अंगड़ाई

होली आई होली आई
पिचकारी के सपने लाई

गुल्ले खाओ गुझिया खाओ
मिल कर खाओ खूब मिठाई
चौटाल गाओ फगवा गाओ
पिचकारी ने धूम मचाई

होली आई होली आई
पिचकारी के सपने लाई

प्यारे फूल


प्यारे फूल

 
 दीवारों पर झूला करते
झूल झूल कर फूला करते
रंग बिरंगे न्यारे फूल
पिटूनिया के प्यारे फूल

कभी हवा से हिल जाते हैं
कभी किरन से खिल जाते हैं
सबकी आँख के तारे फूल
पिटूनिया के प्यारे फूल

खिल खिल कर वे मुस्काते हैं
हमको भी खुश कर जाते हैं
इस गमले के सारे फूल
पिटूनिया के प्यारे फूल

नाव


नाव 

 नैया मेरी बड़ी मज़े की
लहरों पर झूला करती
कागज़ की वह बनी हुई है
फूलों का बोझा भरती 
1
गुड्डे गुड़ियों को ले जा कर
है तालाब दिखा लाती
परवा उसे न पतवारों की
बिन माझी आती जाती
1
आहा कितनी हल्की वह है
जल में है डूबती नहीं
कभी किसी ने देखी है क्या
ऐसी सुन्दर नाव कहीं ?

सर्दी में


सर्दी में

 
 सर्दी में अच्छी लगती है
हरी गलीचा दूब
घर के बाहर जमी हुयी है
नरम गुनगुनी धूप 
1
फूल फूल भर बाग सजा है
तितली तितली मौसम
थोड़े ही दिन को आता है
यह सर्दी का सरगम
1
नानी के घर बर्फ पड़ रही
टनकपूर में घर है
आग जली है आगदान में
ताज़ी यही खबर है 
1
नहीं धूप है पड़ी दिखाई
हफ्तों से आँगन में
नाना थोडे परेशान थे
फोन किया जब हमने

दिवाली


दिवाली

मेज भरी पकवान दिवाली
राकेट की उड़ान दिवाली
लक्ष्मी गणपति खील खिलौने
सजी धजी दूकान दिवाली
दीयों की कतार दिवाली
फुलझड़ियाँ अनार दिवाली
घर आँगन मन उपवन सारा
ज्योतिर्मय संसार दिवाली

      

मेरा छाता


मेरा छाता  



 
पीले रंग का मेरा छाता,
यह वर्षा से मुझे बचाता।
कड़ी धूप या रिमझिम पानी,
दोनों में है साथ निभाता।

पीले छाते की है साथी,
मेरी यह काली बरसाती।
खुद पानी से तर हो जाती,
लेकिन मुझको सदा बचाती।

इनके साथ मज़ा जीने का,
बारिश की बूँदें पीने का।
अच्छा लगता मुझको भाता,
पीले रंग का मेरा छाता।

टोपी



हर फोटो में आती टोपी
हर मौसम में भाती टोपी
घनी धूप में हमें बचाती
सर्द में है गरमाती
रंग रंग की रूप रूप की
दुनिया को भरमाती टोपी
गरमी में तिनकों की जाली
सरदी में वो फुँदनों वाली
खेल जन्मदिन घर और बाहर
सभी जगह सज जाती टोपी

       
टोपी

सूरज


 सूरज

सिर पर सूरज नीचे घास
आओ मिलकर नाचें आज
एक पेड़ है लम्बा सा
फिर भी मुझसे छोटा सा
आसमान में दो कौवे
रंग है उनका नीला सा
भूरे जूते भूरे बाल
शर्ट सफेद धारियाँ लाल
हरी घास और पीला सूरज
दिन को करता कैसा जगमग
हँसो हँसाओ आओ पास
सिर पर सूरज नीचे घास

सर्दी का सूरज


सर्दी का सूरज 

सुबह सुबह आ जाता सूरज
दंगा नहीं मचाता सूरज
1
ना आँधी ना धूल पसीना
सरदी में मनभाता सूरज 
1
छतरी लगा बाग में बैठो
पिकनिक रोज़ मनाता सूरज
1
बर्गर हो या पिज़ा पेस्ट्री
सबके मज़े बढ़ाता सूरज
1
नरम दूब पर छाया रहता
यहाँ वहाँ इतराता सूरज
1
दिन भर मेरे साथ खेलता
शाम ढले घर जाता सूरज

क्रिकेट



क्रिकेट


क्रिकेट का जब चढ़ा बुखार
मन में आया एक विचार।

क्यों न मैं एक टीम बनाऊँ
पहला ही कप जीत के लाऊँ।
मैं बोला कप्तान बनूँगा
बैंटिंग पहले मैं ही लूँगा।

मेरे हाथ में बैट जो आया
कपिल देव को मज़ा चखाया।
आखिरी गेंद कपिल ने फेंकी
मैंने छक्के की कोशिश की।

क्रीज़ छोड़कर मैंने मारा
डर गया कपिल बेचारा।
गेंद लगी खिड़की से जाकर
शीशा चूर हुआ टकराकर।

लेकर डण्डा मम्मी आई
सबसे छुप कर जान बचाई।
पड़ गए डण्डे मुझ पर चार
उतर गया क्रिकेट का बुखार।।

बंदर मामा


बंदर मामा

बांदर मामा पहने सूट
पैर में उनके बढ़िया बूट

जेब का आला गले में डाला
बैग दवाई का ले डाला

साइन बोर्ड अपना लगवाया
डाक्टर बांदर सिंह लिखवाया

चिंटू मेरा दोस्त


चिंटू मेरा दोस्त
 

चिंटू मेरा अच्छा दोस्त,
खाता अंडा मक्खन टोस्ट।

सुबह–सुबह जल्दी उठता है
शाला में अच्छा पढ़ता है
रोज इनाम नये पाता है
झटपट आकर दिखलाता है

अच्छा है ना मेरा दोस्त ?
खाता अंडा मक्खन टोस्ट।

नया साल है

                                                                         om namah shivay

नया साल है

नया साल है नया साल है
खूब ख़ुशी है खूब धमाल है।

पढ़ने लिखने से छुट्टी है
घर बाहर हर पल मस्ती है
खाना पीना माल टाल है
नया साल है नया साल है।

सभी ओर उत्सव की धूम है
लगा साथियों का हुजूम है
गाना वाना मस्त ताल है
नया साल है नया साल है।

चिंटू और चीनी


चिंटू और चीनी

चिंटू और चीनी भाईबहन थे। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे इसलिए एकसाथ आतेजाते थे।चिंटू और चीनी के स्वभाव बिलकुल भिन्न थे। चीनी सीधीसादी थी, जबकि चिंटू को घर में रखी चीजें खाने की बहुत बुरी आदत थी।

बिस्कुट हो या नमकीन, पेस्ट्री हो या चौकलेट वह कुछ नहीं छोड़ता था। अकसर माँ उसे इस बात के लिए डाँटती भी थीं। पर उसपर इन बातों का कोई असर नहीं होता था। एक दिन गुस्से में आकर माँ ने उस अलमारी को ही ताला लगा दिया जिसमें बिस्कुट आदि चीजें रखीं हुई थीं। उस अलमारी में बिस्कुट आदि के अलावा दवाइयाँ व कुछ अन्य सामान भी रखा हुआ था।

एक दिन चिंटू और चीनी स्कूल से लौटे। चीनी की तबीयत आते ही कुछ खराब हो गई। पहले तो चिंटू ने ध्यान नहीं दिया जब पर चीनी की तबीयत कुछ ज्यादा बिगड़ने लगी तो उसने माँ को आफिस फोन किया और उन्हें चीनी की बिगड़ती हुई तबीयत के बारे में बताया।

माँ बोलीं,``चिंटू लगता है चीनी को लू लग गई है। तुम अलमारी में रखे ग्लूकोस को घोलकर पिला दो, तब तक मैं डाक्टर को फोन करती हूँ। पर तुुम ग्लूकोस को घोल कर पिलाते रहना वरना मुश्किल हो जाएगी। ''

चिंटू जल्दी से रिसीवर रखकर अलमारी से ग्लूकोस निकालने के लिए ज्यों ही अलमारी के पास पहुँचा, देखा ताला लगा था। उसने इधर-उधर चाबी ढूँढी पर उसे कहीं न मिली। तब उसने फिर से माँ के ऑफिस फोन किया।
माँ बोलीं,``ओह बेटा, चाबी तो मेरे पास है।''
``अब क्या होगा मां,'' चिंटू फोन पर ही रो पड़ा, ``अब क्या करूँ?''
फिर रोते हुए मम्मीसे बोला,``आपने अलमारी को ताला क्यों लगाया। आपको पता था कि उसमें ग्लूकोस है फिर। ''
``पर चिंटू तुम्हें भी तो पता था कि उसमें बिस्कुट पड़े हैं जो तुम रोज चुपचुप खा जाते हो। न तुम बिस्कुट खाते न मैं ताला लगाती और न चीनी का इतना बुरा हाल होता। अच्छा, मैं डाक्टर को लेकर अभी आती हूँ।'' कह कर माँ ने रिसीवर रख दिया।

चिंटू की हालत खराब! कभी वह चीनी को देखता तो कभी रोता।थोड़ी देर में माँ आ गई।
``आप अकेली आई हैं,'' माँ के घर में घुसते ही चिंटू ने पूछा, ``आपको पता है चीनी की तबीयत कितनी खराब है।''
तभी अंदर से आवाज आई,`` मैं तो ठीक-ठाक हूँ भइया।''
``अरे माँ के आते ही तू ठीक हो गई मेरी बहन,'' कहकर चिंटू ने चीनी को गले से लगा लिया।
``अब मैं कभी चोरी नहीं करूँगा कभी नहीं ,'' कहते हुए चिंटू रो पड़ा।
माँ ने चिंटू और चीनी को गले से लगा लिया।
असल में चीनी और माँ ने ही मिलकर चिंटू को सबक सिखाने की योजना बनाई थी

लाल गुब्बारा --पूर्णिमा वर्मन


लाल गुब्बारा

गली में गुब्बारेवाला था। नैना ने उसकी आवाज़ सुनी और दौड़ कर बाहर आई।
गुब्बारे वाले के हाथ में पाँच गुब्बारे थे। दो लाल, एक पीला, एक हरा और एक गुलाबी। एक गाड़ी भी थी। गाड़ी पर पीली छतरी थी। छतरी बड़ी थी। सबको छाया देती थी। गाड़ी में रंग ``बिरंगे गुब्बारे भरे हुए थे।
नैना ने सोचा वह अपनी फ्राक जैसा लाल गुब्बारा लेगी।
"मुझे एक गुब्बारा चाहिये।" नैना ने कहा।
"क्या तुम्हारे पास पैसे हैं?" गुब्बारेवाले ने पूछा।
"लाल गुब्बारा कितने का है? मैं माँ से पैसे ले कर आती हूँ।" नैना ने कहा।
"दो रूपये ले कर आना।" गुब्बारेवाले ने कहा।

नैना माँ के पास से पैसे लेकर आई। गुब्बारे वाले को पैसे दिये और लाल गुब्बारा खरीदा।
गुब्बारा लेकर नैना गली में खेलने लगी। गली में भीड़ नहीं थी। लाल गुब्बारा पतंग की तरह लहरा रहा था। नैना धागे को उँगली पर लपेट लेती तो गुब्बारा उसके पास आ जाता। वह उसको गाल से लगाती तो नरम नरम लगता। रगड़ती तो मज़ेदार आवाज़ करता। वह धागे को छोड़ देती तो लाल गुब्बारा फिर से दूर आसमान में उड़ने लगता। वह दौड़ती तो गुब्बारा भी साथ साथ ऊपर चलता।

गली में खेलना नैना को अच्छा लगता था। खेल में बड़ा मज़ा था। नैना देर तक खेलती रही। लाल गुब्बारा उसका दोस्त बन गया। उसने लाल गुब्बारे का नाम 'लालू' रख दिया।

"बहुत देर हो गयी नैना, खेलना बंद करो और खाना खा लो।" माँ ने भीतर से आवाज़ दी।
नैना को भी भूख लग रही थी। "आती हूँ माँ," नैना ने जवाब दिया।


लेकिन वो लाल गुब्बारे के साथ खाना कैसे खाएगी, नैना ने सोचा। उसने गुब्बारे के धागे को दरवाज़े की कुंडी से बाँध दिया।
"लालू, मैं खाना खा लूँ तब तक तुम यहीं रहना। बाद में हम दोनों मिल कर फिर खेलेंगे।" नैना ने कहा।
शायद नैना ठीक से बाँध नहीं पायी। धागा खुल गया और लाल गुब्बारा आसमान में उड़ गया।

नैना उसको पकड़ने के लिये दौड़ी पर वह ऊपर जा चुका था। नैना धागा नहीं पकड़ पाई। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह रोने लगी।

माँ ने कहा, "रो मत। कल नया गुब्बारा ले लेना।"

सैर - पूर्णिमा वर्मन


सैर 
रविवार का दिन था। सबकी छुट्टी थी। आसमान साफ था और ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी। सूरज की किरणें शहर के ऊपर बिखरी थीं। धूप में गरमी नहीं थी। मौसम सुहावना था। बिलकुल वैसा जैसा एक पिकनिक के लिए होना चाहिये। मन्नू सोचने लगा, काश! आज हम कहीं घूमने जा सकते।
 
मन्नू रसोई में आया। माँ बेसिन में बर्तन धो रही थी।
"माँ क्या आज हम कहीं घूमने चल सकते हैं?" मन्नू ने पूछा।
"क्यों नही, अगर तुम्हारा स्कूल का काम पूरा हो गया तो हम ज़रूर घूमने चलेंगे।" माँ ने कहा।
"मैं आधे घंटे के अंदर स्कूल का काम पूरा कर सकता हूँ।" मन्नू ने कहा।
मन्नू स्कूल का काम करने बैठ गया।
"हम कहाँ घूमने चलेंगे?" मन्नू ने पूछा।
"बाबा और मुन्नी ने गांधी पार्क का कार्यक्रम बनाया है।" माँ ने बताया।
"यह पार्क तो हमने पहले कभी नहीं देखा?" मन्नू ने पूछा।
"हाँ, इसीलिये तो।" माँ ने उत्तर दिया।
मन्नू काम पूरा कर के बाहर आ गया।
"क्या गांधी पार्क बहुत दूर है?" मुन्नी ने पूछा।
"हाँ, हमें कार से लम्बा सफर करना होगा।" बाबा ने बताया।
सुबह के काम पूरे कर के सब लोग तैयार हुए। माँ ने खाने पीने की कुछ चीज़ें साथ में ली और वे सब कार में बैठ कर सैर को निकल पड़े।
रास्ता मज़ेदार था। सड़क के दोनो ओर पेड़ थे। हरी घास सुंदर दिखती थी। सड़क पर यातायात बहुत कम था। सफ़ेद रंग के बादल आसमान में उड़ रहे थे। बाबा कार चला रहे थे। मुन्नी ने मीठी पिपरमिंट सबको बांट दी। कार में गाने सुनते हुए रास्ता कब पार हो गया उन्हें पता ही नहीं चला। बाबा ने कार रोकी। माँ ने कहा सामान बाहर निकालो अब हम उतरेंगे।
गांधी पार्क में अंदर जा कर मुन्नी ने देखा चारों तरफ हरियाली थी। वह इधर-उधर घूमने लगी। बहुत से पेड़ थे। कुछ दूर पर एक नहर भी थी। नहर के ऊपर पुल था। उसने पुल के ऊपर चढ़ कर देखा। बड़ा सा बाग था। एक तरफ फूलों की क्यारियाँ थीं। थोड़ा आगे चल कर मुन्नी ने देखा गंाधी जी की एक मूर्ति भी थी।
घूमते-घूमते मुन्नी को प्यास लगने लगी। माँ ने मुन्नी को गिलास में संतरे का जूस दिया। माँ और बाबा पार्क के बीच में बने लंबे रास्ते पर टहलने लगे। मुन्नी फूलों की क्यारियों के पास तितलियाँ पकड़ने लगी। तितलियाँ तेज़ी से उड़ती थीं और आसानी से पकड़ में नहीं आती थीं। तितलियों के पीछे दौड़ते-दौड़ते जब वह थक गयी तो एक पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठ गयी।
उसने देखा पार्क में थोड़ी दूर पर झूले लगे थे। मन्नू एक फिसलपट्टी के ऊपर से मुन्नी को पुकार रहा था,
"मुन्नी मुन्नी यहाँ आकर देखो कितना मज़ा आ रहा है।"
मुन्नी आराम करना भूल कर झूलों के पास चली गयी। वे दोनों अलग अलग तरह के झूलों का मज़ा लेते रहे।
"मन्नू - मुन्नी बहुत देर हो गयी? घर नहीं चलना है क्या?"
माँ और बाबा बच्चों से पूछ रहे थे।
दोनों बच्चे भाग कर पास आ गए।
"पार्क कैसा लगा बच्चों?" माँ ने पूछा।
"बहुत बढ़िया" मन्नू और मुन्नी ने कहा। वे खुश दिखाई देते थे।
चलो, अब वापस चलें, फिर किसी दिन दुबारा आ जाएँगे।" बाबा ने कहा।
सफर मज़ेदार था। दिन सफल हो गया। बच्चों ने सोचा।
सब लोग कार में बैठ गए। बाबा ने कार मोड़ी और घर की ओर ले ली। मौसम अभी भी बढ़िया था। मुन्नी फिर से सबको मीठी पिपरमिंट देना नहीं भूली। सैर की सफलता के बाद सब घर लौट रहे थे। 


१ अक्तूबर २००३